Tuesday, April 12, 2016



'हमारे देश की स्थिति'




-दिवाकर मोहनी




आम तौर पर माना जाता है कि अपने देश में ​ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को शिक्षा से वंचित रखा और यह कार्य उन्होंने अपनी स्वार्थसिद्धि के चलते किया. यानी वे समाज में विषमता को बनाए रखना चाहते थे, ताकि अन्य जातियों का शोषण कर सकें. उच्चवर्णीयों पर यह आरोप कितना सच है, इस बात की तटस्थता से जांच करने के लिए हमें अपने देश की तत्कालीन स्थिति को समझना होगा और तकरीबन 200 साल पीछे जाना होगा. भारत में अंग्रेजों का राज होने से पहले की सामाजिक स्थिति का भी पता करना पड़ेगा. उसके प्रतिपादन के लिए कुछ पुरानी, स्त्री-शूद्र जैसी संज्ञाओं का इस्तेमाल भी करने की जरूरत पड़ेगी.
यह निश्चय ही सच है कि ​ब्राह्मणों ने शूद्रों को शिक्षा प्राप्त नहीं करने दी, पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उन्होंने शूद्रों के साथ अपनी खुद की बेटियों को भी नहीं पढ़ाया. जिस काल में ​ब्राह्मण खुद पढ़ते थे और दूसरी जातियों को पढ़ने नहीं देते थे, उस काल में वे क्या पढ़ते थे, यह देखना होगा और यह भी कि स्त्रियों तथा शूद्रों की दिनचर्या कैसी थी.
अंग्रजों का राज आने से पहले शिक्षा प्रदान करनेवाले भी ​ब्राह्मण और शिक्षा पानेवाले भी ​ब्राह्मण थे. इसका अर्थ यह नहीं था कि ​ब्राह्मणों के अलावा अन्य जातियों के लोग साक्षर नहीं थे और साक्षरता के कारण जो शिक्षा मिलती है, वे उसे हासिल नहीं करते थे. साक्षरता प्राप्त करनेवालों में ​ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य, तीनों वर्णो के लोग थे. इन तीनों वर्णो की स्त्रियां की तरह ही शूद्र भी निरक्षर थे. ​ब्राह्मणों के व्यवसाय तीन-चार प्रकर के होते हैं. वे उपाध्याय होते हैं, पुराणिक होते हैं और जोशी यानी ज्योतिषी होते हैं. इसी तरह वे शासकों के हाथ के नीचे लिपिक भी थे. इसके अलावा उनके खाते में रसोइये और पेयजल भरना जैसे कार्य भी आते थे. बहुत थोड़े से लोग यज्ञ करवाना जैसे विधि-विधान सीखते. और उसमें से थोड़े से लोग व्याकरण, न्याय, काव्य जैसे शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करते. इसके अलावा ​ब्राह्मणों को और कोई भी कार्य करना नहीं आता था.
उत्तर भारत में अंग्रजों के आने के पहले छोटी-बड़ी रियासतों के दरबार में मुख्यत: कायस्थ पदस्थ होते थे. कायस्थ खुद को मसीजीवी (मसी यानी स्याही) क्षत्रिय कहते थे और फारसी सीखते थे.
दरबार के पत्र-व्यवहार के साथ लेखा और फारसी भाषा संबंधी कार्य उनके हवाले थे. महाराष्ट्र में लेखे को ‘फड़’ कहते हैं और इसलिए लेखाकार/मुनीम को ‘फड़नवीस’ की संज्ञा दी गई. महाराष्ट्र में राजाओं के दरबार में फारसी जाननेवाले लोग भी थे और उन्हें फारसीनवीस कहा जाता था. मौजूदा दौर में यह ‘पारसनीस’ नामक उपनाम के रूप में विद्यमान है. लेकिन, इसे सीखनेवालों की संख्या उंगलियों में गिनने लायक थी. महाराष्ट्र में जो कायस्थ थे, वे भी लेखाकार थे, पर वे खुद को चंद्रसेनी कायस्थ प्रभु कहते थे. साक्षर वैश्य व्यापार और साहूकारी के लिए अपनी साक्षरता का प्रयोग करते थे.
उस काल में पाठशालाएं तात्या-पंत जी (पंडितजी) की थीं. ये पाठशालाएं मंदिर के सभामंडप अथवा किसी के बरामदे में भरती थीं. उसमें जो शिक्षा दी जाती थी, उनमें लेखन-वाचन और गणित शामिल थे. बालबोध और मोड़ी भाषा/लिपि को पढ़ना सिखाया जाता था और विकट पहाड़े को हूंठा (अद्धा, पौना, सवैया, ड्यौढ़ा/डेढ़िया, अढ़ैया और हूंठा) तक रटवा दिया जाता था.
अंकगणित का प्रारंभ धन, ऋण, गुणा, भाग से होता था. ​ब्राह्मणों के बच्चों को जो इससे अधिक शिक्षा दी जाती थी, वे अक्सर उनके पिता ही देते थे. इसमें धार्मिक अनुष्ठान एवं विधि-विधान सिखाए जाते थे. पंचांग वाचन, मुहूर्त देखना, कुंडली पढ़ना, चतुर्थी, एकादशी, अमावस्था, पूर्णिमा, सूर्य एवं चंद्र ग्रहण, व्रत तिथियां आदि निकालना सिखाया जाता था और उसके लिए लगनेवाली साधारण संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी. थोड़े-बहुत विद्यार्थियों को जिज्ञासा के आधार पर यज्ञ, व्याकरण, काव्य और शास्त्र सिखाने के लिए तीर्थस्थानों पर भेजा जाता था. महाराष्ट्र में ये तीर्थस्थान कृष्णा नदी के किनारे स्थित वाई और गोदावरी के तट पर स्थित पैठन और नासिक जैसे इक्का-दुक्का शहर थे. यह शिक्षा केवल धार्मिक कर्मकांड करने के लिए उपयोगी थी. शिक्षा के इन ठिकानों को वेदशाला कहा जाता था. तात्या पंतोजी के निर्वाह के लिए उन्हें कुछ ‘शीधा’ दिया जाता था, जबकि वेदशाला किसी सेठ या राजा अथवा संस्थान के आश्रय पर चलती थी.
पंडितजी की पाठशाला से पढ़कर निकले छात्रों को गांव का रिकॉर्ड रखनेवाले (कुलकर्णीपण) यानी पटवारियों अथवा तलाठियों का काम करना आता था. अथवा किसी देशमुख के पास मुनीम या दीवान अथवा लिपिक का काम मिल जाता था. सालाना 20-25 रुपए वेतन मिलता था. गांव में कृषि से इतर कार्य करनेवाले किसानों से लेन-देन आने लायक गणित अपने पिता से सीख लेते थे. गरीब-गुरबों और खेतों के मालिक किसानों को साक्षर होने की जरूरत महसूस नहीं होती थी. साक्षर होने पर ज्यादा लाभ न होने का हिसाब उन्हें निरक्षर बनाए रखता था. इसकी वजह से निरक्षरों को जो ज्ञान प्राप्त होता था, वह कथा-कीर्तनों से होता था. सार्वजनिक पाठशालाएं नहीं थीं. यह स्थिति पुरुषों की शिक्षा की थी.
उस समय लड़कियों की शादी नौ अथवा दस वर्ष की उम्र में कर दी जाती थी और उनका पूरा दिन घर के कामों में गुजरता था. तड़के उठकर चावल कूटना, आटा पीसना, या दाल दलना; सूर्योदय के साथ ही घर की साफ-सफाई करना, उसके बाद रात के जूठे बरतन साफ करना, भोजन बनाना, दुधारू जानवरों को चारा-पानी देना, दूध दुहना, नदी-तालाब अथवा कुएं से पानी भरना, नदी पर जाकर कपड़े धोना, बच्चों को शौच करवाना, बच्चों को दूध पिलाना, खाद्यान्न चुनना, खेत में निंदाई-गुड़ाई करना, घर में मरीजों की सेवा करना, जलाऊ लकड़ी चुनना, छोटे भाई-बहनों को संभालना जैसे काम उसके हवाले होते थे.
यह सभी काम करने में महिलाओं का दम निकल जाता था. उस काल में स्त्रियों के पीछे त्यौहार, व्रत, कुलधर्म, कुलाचार और ​ब्राह्मणों के घर में ‘सोला’ जैसे आचारों का बड़ा जोर था. इसक वजह से साक्षर होने का विचार करने का समय मिलना भी संभव नहीं था. ऐसी स्थिति होने के बावजूद जिन स्त्रियों ने शिक्षा प्राप्त की, वे संपन्न घरानों की थीं. उनके कुछ काम नौकर कर लेते थे. इस वजह से वे पढ़ाई के लिए कुछ समय निकाल पाती थीं.
पुरुषों को खेतों और उनके व्यवसाय अथवा जाति के मुताबिक काम करना पड़ता था.
कामगार जातियों में बुनकर, गड़रिए, माली, मछुआरों के काम के स्वरूप ऐसे थे कि उन्हें दिन में 24 घंटे भी कम पड़ते थे. लोहार, बढ़ई, राजमिस्त्री जैसे काम मौसमी थे. जब काम होता, तो उन्हें 24 घंटे कम पड़ते और जब नहीं होता तो वे दूसरे दिन की चिंता में डूबे रहते. उन्हें भी साक्षर होने से कोई फायदा नहीं था. आज भी स्थिति बहुत बदली नहीं है. इतना ही नहीं, निरक्षरों का साक्षर होना यानी एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में प्रवेश, एक युग से दूसरे युग में जाने जैसा है. ज्ञान ग्रहण करने के लिए जो अब तक कानों का उपयोग करते थे, उन्हें कानों के बजाय अब आंखों का प्रयोग करना था. यह एक तरह का संस्कृत्यंतर था. प्रारंभ में इस समस्या से बहुत थोड़े लोग पार पा सके. शासकों को भी नहीं लगता था कि उनकी प्रजा को साक्षर होना चाहिए. उस मोर्चे पर भी सन्नाटा था. पाठशालाओं में इस्तेमाल के लिए मुद्रित पुस्तकें नहीं थीं, क्योंकि छापाखाने नहीं थे. कागज-पेंसिल का उपयोग नहीं था, क्योंकि उसके भी कारखाने नहीं थे. अक्षरज्ञान मृदापट्ट के जरिए होता था. यह स्थिति अंग्रेजों के आगमन के पूर्व थी और अब भी वही पुरानी मानसिकता को लेकर हम भारतीय जी रहे हैं.
हम जिस महाराष्ट्र के बारे में विचार करते हैं, वह अंग्रेजों का राज से पूर्व का महाराष्ट्र है. मुङो यह कहने में एतराज नहीं कि उस काल में भारत में अराजकता फैली हुई थी. बहुत सी छोटी-बड़ी रियासतें थीं. उनमें आपस में लगातार संघर्ष चलता रहता था. प्रत्येक राजा अपनी रियासत के विस्तार का प्रयत्न करता रहता था. संपूर्ण भारत अथवा भारत के हित का विचार किसी भी राजा के मन में नहीं था; और आम जनता अपने परिवार और अधिक से अधिक अपनी जाति के बारे में विचार करती थी. यह उल्लेखनीय है कि इस परिस्थिति के चलते विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण, लूट और कब्जे हुए.
समाज का नेतृत्व मुख्यत: ​ब्राह्मणों के पास था और उन ​ब्राह्मणों को अंधविश्वास ने जकड़ रखा था. वे केवल बेकार के कर्मकांड करने में जुटे थे. यही नहीं, उनकी पाप-पुण्य की अवधारणा जहां निराधार थी, वहीं बहुत सख्त थी. इसकी वजह से वे दूसरों पर घोर अन्याय कर रहे थे. उन्होंने अपने परिवार की विधवाओं पर जघन्य अत्याचार किए हैं. तब की विधवाएं उन अत्याचारों को देवधर्म और पाप-पुण्य की अवधारणा के आधार पर चुपचाप सह रही थीं. उस अवधारणा को बदलने का काम सौ-सवा सौ साल पहले समाज-सुधारकों ने शुरू किया. अब भी वह अपूर्ण है. तब विधवाओं की संख्या भी बहुत अधिक थी. इसका कारण यह था कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है. पुरुष जितनी आसानी से संक्रामक रोगों से पीड़ित हो सकता है, उतनी जल्दी महिलाएं नहीं. उन महिलाओं से तत्कालीन पुरुषों को कोई सहानुभूति नहीं थी, जिनके पति गुजर गए थे. महिलाओं को भी नहीं थी. लोगों के सिर पर शकुन-अपशकुन सवार थे और जल्दी मर जानेवाले पुरुषों की मौत का कारण तलाशने की वजह से उसे उनकी पत्नियों के भाग्य से जोड़ दिया जाता था. वे उन महिलाओं को हर कदम पर अपमानित करते थे. विधवाओं को सती होना पड़ता था. यह सभी चीजें अंधश्रद्धा की वजह से थीं.
विधवा का सती होना उनके और परिजनों के लिए पुण्य का काम माना जाता था. विधवाओं का जब तक मुंडन नहीं होता था, उन्हें अस्पृश्य माना जाता था. उनके दर्शन और स्पर्श, दोनों वर्ज्य थे. तब पवित्र-अपवित्र की अवधारणा भी अति चमत्कारिक थी. इसकी वजह से भोजन के वक्त पंगतभेद होता था. किसके साथ भोजन करना और किसके साथ नहीं, इसके नियम अत्यंत कड़े थे. इसे ‘रोटी का व्यवहार’ कहते थे. जिन जातियों के बीच साथ में भोजन नहीं होता था, वहां बेटियों का विवाह नहीं किया जा सकता था.
​ब्राह्मणों को केवल विधवाओं के बालों से ही परहेज नहीं था, बल्कि उन्हें मांसाहार करनेवाली सभी जातियों से परहेज था. हरेक जाति खुद को उच्च समझती थी और अपने से नीचे की जाति से रोटी का व्यवहार नहीं करती थी. जिन जातियों अथवा व्यक्तियों का खून से संबंध था, उन सबसे ​ब्राह्मणों को परहेज था. इस वजह से घरों की रजस्वला और सद्यप्रसूता महिलाओं से भी उन्हें परहेज था. जो जातियां खून अथवा मृत्यु से संबंधित रस्मों या सामग्रियों का व्यवसाय करती थीं, उनसे भी उन्हें परहेज था.
लोकमान्य तिलक के जीवन में पंचहौद मिशन प्रकरण महत्वपूर्ण है. वहां पहुंचे उन ​ब्राह्मणों का बहिष्कार कर दिया गया था, जिन्होंने चाय-बिस्किट खाई थी. यह समूचा अंधविश्वास हमारे हिंदू धर्म से और उसकी पाप-पुण्य की धारणा से जुड़ा था और उसके विरुद्ध काम करनेवाले, चाहे वे सहभोज करनेवाले हों, अथवा विधवा-विवाह करनेवाले, धर्मभ्रष्ट माने जाते थे और उनको बहिष्कृत कर दिया जाता था. गोवा में ईसाइयों के पैर से छू जानेवाले कुएं के पानी पीने पर कई गांवों को स्थायी रूप से बहिष्कृत कर दिया गया.
जाति भेद और अस्पृश्यता, ये दोनों प्रथाएं अत्यंत गहरे पैठे अंधविश्वास की वजह से बनी हैं. ..और जहां तक शोषण की बात है तो वह हम सभी एक-दूसरे का करते आए हैं.


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अंग्रेजों के आगमन के बाद हम ऐसे अंधविश्वास से धीरे-धीरे बाहर आने लगे. भारत में अंग्रेजों का राज आने से बहुत अंतर आ गया. अंग्रजों की विचारपद्धति हमसे अलग थी. ऐसा नहीं है कि वे केवल सेना लेकर यहां आए. वे साथ में मुद्रित पुस्तकें, सार्वजनिक पाठशालाएं सार्वजनिक अस्पताल, नगरीय निकाय (म्युनिसिपॉलिटी) भी यहां लाए. ये सब हमारे लिए बहुत नई चीज थी. भारत में अंग्रजों और यूरोपीयों के आगमन के बाद उन्होंने अपने धर्म की वृद्धि के लिए हमारे धर्म का अध्ययन किया. उसके साथ ही सघन वनों में जाकर लोगों की सेवा की और उन्हें ईसाई धर्म के पक्ष में कर लिया. उन्होंने यहां की जातियों-उपजातियों और आदिवासियों के रीति-रिवाजों का अध्ययन किया.


उन्होंने जमीन नापी और सर्वेक्षण किया. वे रेलगाड़ियां लाए, दूरबीन लाए, डाक विभाग स्थापित किया, छापाखाने बनाए, मूक-बधिरों के लिए संकेत-भाषा और नेत्रहीनों के लिए ब्रेल लिपि लाए . ये सब चीजें तब तक हमारी कल्पना से परे थीं. हमारे पास लोहार थे, बढ़ई थे, पर वे अपने-अपने परिवार में अलग-अलग काम करते थे.
हमारे लोहारों ने ऐसा लौहस्तंभ बनाया, जिसमें जंग नहीं लग सकती थी, जिसे दिल्ली में स्थापित किया गया. लेकिन, वह विद्या सभी तक नहीं पहुंच पाई. हमने जंजीरें बनाईं, पर हम पटरियां नहीं बना सके. हमारे पास बैलगाड़ियां थीं, पर वे ट्रॉम ले आए. प्रारंभ में ट्रॉम लकड़ी की पटरियों पर चलती थी और घोड़े उन्हें खींचते थे. इस वहज से दो घोड़े बहुत सारे लोगों को आसानी से खींचकर ले जा सकत थे. अंग्रेज जो सबसे बड़ी जो चीज लाए, वह था भाप का इंजन. इन सब चीजों से उन्होंने हमें यह पाठ पढ़ाया कि कम श्रम से ज्यादा काम कैसे किया जाए.
कम श्रम में ज्यादा काम करने की विद्या हमे पता ही नहीं थी. श्रम सतत कम करते जाने के लिए साधन सुधारना और नवनवीन उपकरण बनाना; साथ ही मानव अथवा पशुओं की मांसपेशियों की ऊर्जा का इस्तेमाल करने के बजाय दूसरे कार्यों में उस ऊर्जा का उपयोग करने की दृष्टि हमारे पास नहीं थी, पर उनके पास थी.
दालें दलने और सूत कातने के लिए उन्होंने पहले पानी के पाइपों में बहते पानी का प्रयोग किया और उसके बाद भाप का इस्तेमाल किया. जब बिजली की खोज हो गई तो उन्होंने भाप के इंजन/टर्बाइन बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल किए. अंग्रेजों ने यह इंग्लैंड में ये कार्य शुरू किए और जल्द ही भारत में भी उनका प्रयोग करना शुरू कर दिया.
हम लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए स्तोत्र पाठ करते रह गए और उन्होंने मनुष्यों का श्रम कम किया और समय भी बचाया. उन्हें पता चल गया था कि मनुष्यों का श्रम और समय बचने का मतलब ही लक्ष्मी का प्रसन्न होना है. लेकिन, हम इसे नहीं समझ पाए. हमारा आर्थिक इतिहास बताता है कि हम सोचते हैं कि शोषण के अलावा और कोई रास्ता समृद्धि नहीं ला सकता. यह केवल समझ ही नहीं, वास्तविकता है. अपना काम दूसरों से करवाना और उसे उस काम का उचित पारिश्रमिक नहीं देना यानी शोषण. हमारे समूचे अर्थशास्त्र की इमारत इस नींव पर टिकी है कि किसी का शोषण किए बिना संपत्ति का संचय नहीं हो सकता और धनसंचय किए बिना पूंजी पैदा नहीं हो सकती. (चूंकि यह एक अलग विषय है. इस पर अलग आलेख में विचार करेंगे.)
इस शोषण की वजह से समाज में अति-विषमता पैदा हो गई और उस विषमता से स्पर्धा, संघर्ष, दु:ख और भेदभाव पैदा हुए. इनसे मुक्ति पाने के लिए महात्मा गांधी ने स्वावलंबन का मार्ग दिखाया और स्वावलंबन के तहत हरेक के करने लायक एक काम यानी सूत-कताई को चुना. उसके प्रतीक के रूप में उन्होंने चरखे को चुना. वे खुद नियमित रूप से चरखे पर सूत कातते थे. विनोबा ने उसी विचार को आगे ले जाकर ग्राम स्वराज्य का सिद्धांत बनाया. उन्होंने पाया कि हरेक का पूर्णत: स्वावलंबी होना संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने एक गांव में स्वावलंबी बनाने की अवधारणा रखी. उनके ग्राम स्वराज्य की अवधारणा थी कि किसी गांव-कस्बे के लोग एक-दूसरे के आवश्यक कामों को पूर्ण करें. इसे उन्होंने उस गांव का परस्परावलंबन नाम दिया. विनोबा ने खुद कई वर्षो तक ऋषि-कृषि की. ऋषि-कृषि यानी खेत के सभी काम मनुष्य करे. उसमें बैलों की मदद नहीं ले. पूर्वकाल में ऋषिपंचमी के व्रत में बैलों के श्रम से निर्मित खाद्यपदार्थ वर्ज्य होते थे.


विनोबा मानते थे कि बैलों से श्रम नहीं करवाना यानी ऋषिकार्य करना है, इसलिए उन्होंने मानवीय श्रम से किए गए कृषिकार्य को ऋषि-कृषि कहा. विनोबा का ग्राम स्वराज्य लोकप्रिय नहीं हो पाया अथवा यह कहा जाए कि लोगों ने उसे नकार दिया. इसका कारण अंग्रेजों की उत्पादन पद्धति में मिल जाएगा.
जैसा कि हमने देखा कि अंग्रेजों ने बाहुबल के बजाय कृत्रिम ऊर्जा का प्रयोग किया. सूत कातने और कपड़ा बुनने में उन्होंने भाप के इंजन से चालित यंत्रों का प्रयोग किया. बड़े-बड़े बॉयलर बनाए. बॉयलर में पानी उबालने के लिए प्रयुक्त होनेवाले पत्थर के कोयले का धुआं आस-पास न फैल जाए, इसके लिए उन्होंने विशाल चिमनियां बनाईं. उन मिलों की वजह से बहुत कम श्रम में अधिक कपड़े का उत्पादन होने लगा. मिल के कपड़ों की वजह से सभी लोगों का जीवनस्तर बढ़ा. यानी कपड़ा सस्ता हुआ तो उसे पहनना सभी के लिए संभव हो पाया. दूसरी ओर पहले कपड़ा बनाने में जितने मैन-ऑवर्स (मानव-घंटे) लगते थे, उनकी बचत होने लगी. धीरे-धीरे सभी वस्तुओं के उत्पादन में कृत्रिम ऊर्जा का प्रयोग शुरू हो गया और उसकी वजह से मनुष्य के साथ बैल, घोड़े जैसे प्राणियों का श्रम भी बहुत कम हो गया.


महुआरों को नौकाएं हाथों से खेने की जरूरत नहीं बची, बैलगाड़ियों की जगह मोटरों ने ले ली. मोटर के आने से आदमी का समय और श्रम, दोनों बचे. यह सही है कि इस समूचे कारोबार में पैसा बहुत लगा, पर बहुत लोगों का श्रम बचा. वर्तमान में विज्ञान की इतनी प्रगति हो गई है कि अब सभी का श्रम बच सकता है. लेकिन, ऐसा इसलिए नहीं हो पाता है कि हमारे मन अब भी इसके लिए तैयार नहीं है. मेरी राय है कि सर्वत्र समानता लाना है तो बाह्य ऊर्जा का इस्तेमाल करके ही लाई जा सकेगी. अब तक यह माना जाता है कि खुद के बजाय दूसरों से श्रम करवाकर धनवान बना जा सकता है. मानवीय श्रम के बजाय बाह्य ऊर्जा से चलनेवाले यंत्रों के काम करवाया जाए, तो सभी लोगों का श्रम बचेगा और सभी लोग धनवान हो जाएंगे. इससे उनके बीच समता पैदा होगी.
वस्तुओं के उत्पादन के लिए मानवीय श्रम से इतर बाह्य ऊर्जा का इस्तेमाल किया तो पर्यावरण की अपरिमित हानि होती है. यह एक बड़ा दोष इस ऊर्जा के इस्तेमाल में है. (यह एक अलग विषय है और इस बारे में हम अलग से विचार करेंगे.) थोड़ी-बहुत मानवेतर बाह्य ऊर्जा उपलब्ध होने से स्त्रियों और शूद्रों तक शिक्षा पहुंच पाई है.


वह ऊर्जा जब तक भारत में उपलब्ध नहीं थी, तब तक सार्वत्रिक शिक्षा का विचार असंभव था. सिर्फ भारतवासी ही ऐसे नहीं थे, जो मानवेतर ऊर्जा पैदा करने का विचार नहीं जानते थे; एशिया, अफ्रीका, अमेरिका महाद्वीपों के मूलनिवासियों को भी इस बारे में कुछ पता नहीं था. वह केवल यूरोपवासियों को सूझा और उसकी वजह से वे हम जैसों पर प्रदीर्घकाल राज कर पाए.
मैं इस समूचे घटनाक्रम पर विचार करता हूं तो मुझे यह नहीं लगता है कि उच्चवर्णीयों ने शूद्रों को जबरन शिक्षा से दूर रखा. लेकिन, इस विषय पर संपूर्णता से अध्ययन होना आवश्यक है. मेरा पूर्वाग्रह नहीं है कि यह मान लिया जाए कि मेरा विचार ही सही है. 


आजचा सुधारक

aajachasudharak.in/

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