Monday, June 18, 2007

'समाज सुधार' की सही दिशा

गोपाल गणेश आगरकर को गुजरे सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन उनका यह लेख अब भी प्रासंगिक है. अगले लेख में हम सुधारक के होने कि वजह पर प्रकाश डालेंगे,

'समाज सुधार' की सही दिशा

...'समाज सुधार' सही माने में किन बातों में निहित है, इसे बहुत ही सोच-समझकर तय करना होगा। क्योंकि अक्सर होता यह है कि किसी विशिष्ठ विचार-प्रवाह में बह जाने वाले या किसी मत-प्रणाली के अधीन होकर उसका अन्धानुकरण करने वाले मनुष्य को , वास्तविक अर्थ में 'समाज सुधार' किस बात में है, यह भली-भांति समझ न पाने से, उसे हर पुरानी बात को निकल फेंकने तथा किसी नई बात को अपनाने में कोई बहुत बड़ा समाज सुधार का काम करने का भ्रम हो जाता है। ऐसे लोगों को सुधारक की बजाय 'दुर्धारक' अर्थात समाज का अहित करने वाला या समाज विघातक कहना ही ठीक है। उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में बहुत सारी बुराइयां हैं, इसलिये यहूदी, मुस्लिम, ईसाई या ऐसे ही किसी धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति को विचारशील कहना ठीक नहीं है। जिस देश में हमारे सैकड़ों पूर्वज पैदा हुए, पले-बढ़े और जिन्दगी जीकर सिधार गए, जिस देश में हज़ारों पीढ़ियों के महत्प्रयासों, कष्टों का फल हमें एक थाती के रुप में अनायास ही प्राप्त हुआ, ऐसे देश के धर्म, रीती-रिवाज व लोगों का पूरी तरह त्याग करने वाले मनुष्य को सुधारक का सम्मान शोभा नहीं देता। स्वदेश व स्वभूमि में, स्वजनों के साथ अपने सत्त्वशील आचरण पर अडिग रहकर, अपने देशवासियों के अज्ञान व अविचार को डरे बिना, उनसे कभी लड़-झगड़ कर, कभी युक्तिवाद की चतुराई से, कभी लाड़- प्यार-दुलार के हुनर से या कभी अपने में दमख़म हो तो डांट-dapat अरे उनकी दकियानूसी बातों में सुधार करने में ही सच्ची देशभक्ति, सही भाईचारा, सच्चा देशाभिमान, उचित समझ-बूझ और सत्यशील पुरुषार्थ है। इसके उल्टे जो लोग विपरीत बर्ताव करते हैं, वह समाज सुधार का कोई काम तो नहीं करते, बल्कि एक प्रकार बेड़ियाँ तोड़कर दूसरे प्रकार की बेड़ियाँ में जकड जाते हैं।

2 comments:

अनुनाद सिंह said...

कितना विराट चिन्तन है, कितनी उदार सोच है? यह विचार आज कहीं पहले से ज्यादा प्र्रसंगिक है।

एक बात की कमी थोड़ी खटक रही है। गोपाल आगरकर जी का संक्षिप्त जीवन परिचय दिया जना चाहिये था।

Harsh said...


सुधारक
एक संवाद समाज के साथ

Monday, June 18, 2007
'समाज सुधार' की सही दिशा
गोपाल गणेश आगरकर को गुजरे सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन उनका यह लेख अब भी प्रासंगिक है. अगले लेख में हम सुधारक के होने कि वजह पर प्रकाश डालेंगे,

'समाज सुधार' की सही दिशा

...'समाज सुधार' सही माने में किन बातों में निहित है, इसे बहुत ही सोच-समझकर तय करना होगा। क्योंकि अक्सर होता यह है कि किसी विशिष्ठ विचार-प्रवाह में बह जाने वाले या किसी मत-प्रणाली के अधीन होकर उसका अन्धानुकरण करने वाले मनुष्य को , वास्तविक अर्थ में 'समाज सुधार' किस बात में है, यह भली-भांति समझ न पाने से, उसे हर पुरानी बात को निकल फेंकने तथा किसी नई बात को अपनाने में कोई बहुत बड़ा समाज सुधार का काम करने का भ्रम हो जाता है। ऐसे लोगों को सुधारक की बजाय 'दुर्धारक' अर्थात समाज का अहित करने वाला या समाज विघातक कहना ही ठीक है। उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में बहुत सारी बुराइयां हैं, इसलिये यहूदी, मुस्लिम, ईसाई या ऐसे ही किसी धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति को विचारशील कहना ठीक नहीं है। जिस देश में हमारे सैकड़ों पूर्वज पैदा हुए, पले-बढ़े और जिन्दगी जीकर सिधार गए, जिस देश में हज़ारों पीढ़ियों के महत्प्रयासों, कष्टों का फल हमें एक थाती के रुप में अनायास ही प्राप्त हुआ, ऐसे देश के धर्म, रीती-रिवाज व लोगों का पूरी तरह त्याग करने वाले मनुष्य को सुधारक का सम्मान शोभा नहीं देता। स्वदेश व स्वभूमि में, स्वजनों के साथ अपने सत्त्वशील आचरण पर अडिग रहकर, अपने देशवासियों के अज्ञान व अविचार को डरे बिना, उनसे कभी लड़-झगड़ कर, कभी युक्तिवाद की चतुराई से, कभी लाड़- प्यार-दुलार के हुनर से या कभी अपने में दमख़म हो तो डांट-dapat अरे उनकी दकियानूसी बातों में सुधार करने में ही सच्ची देशभक्ति, सही भाईचारा, सच्चा देशाभिमान, उचित समझ-बूझ और सत्यशील पुरुषार्थ है। इसके उल्टे जो लोग विपरीत बर्ताव करते हैं, वह समाज सुधार का कोई काम तो नहीं करते, बल्कि एक प्रकार बेड़ियाँ तोड़कर दूसरे प्रकार की बेड़ियाँ में जकड जाते हैं