Wednesday, June 20, 2007

सुधारक क्यों और किसलिये

जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, सुधारक वास्तव में एक पत्रिका है। सुधारक नाम की साप्ताहिक पत्रिका गोपाल गणेश आगरकर ने १८८८ में शुरू की थी। आधुनिक महाराष्ट्र का मानस जिन्होंने बनाया, गढ़ा, उनमें आगरकर एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं। आगरकर क्रान्तिदर्शी थे, मनीषी थे। समाज सुधर में महाराष्ट्र जो कुछ कर पाया, उसका कारण सौ वर्ष पूर्व महादेव गोविन्द रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, ज्योतिबा फुले एवं गोपाल गणेश आगरकर जैसे विचारकों ने तत्कालीन रुढ़िबद्ध समाज को जागृत किया। उनके द्वारा आरम्भ किया गया जागरण का कार्य अनवरत चलना चाहिए, यह सोचकर आजचा (आज का ) सुधारक का प्रकाशन मराठी में १७ साल पूर्व शुरू हुआ और ७ साल पहले हिंदी में। हिंदी का प्रकाशन विगत एक वर्ष से स्थगित है। कारण सुधी पाठकों तक हमारी पहुंच ना बन पाना और जिन तक पहुंच बनी, उनसे प्रतिक्रिया ना मिलना रह।। हमने सोचा है कि इंटरनेट पर हिन्दीभाषी प्रबुद्ध पाठक तक पहुंच बनाना शायद आसान होगा. सो, हमने वेबसाइट बनने से पहले ब्लोग का प्रयोग करना उचित समझा.
बहरहाल, सुधारक वह होता है, जो हर दिन क्या, प्रतिपल सुधार का विचार करता है (और जितना बन सके, उतना आचरण भी करता है ). अपना विचार, अपना आधार गलत ना हो, तर्कसंगत हो, समाज में सुख की मात्रा बढाने वाला हो, इसलिए विचार को परखना पड़ता है। विचार को परखने का काम प्रस्तुत पत्रिका करेगी। पाठकों के समक्ष कुछ विचार रखे जाएंगे और उनकी परीक्षा सभी लोग करेंगे । परीक्षकों में कोई भी श्रेष्ट या कनिष्ठ न होगा । सभी एक दूसरे के विचारों पर अपनी राय प्रकट करेंगे । इस प्रकार विचार का एक मुक्त मंच बनेगा सुधारक।
विचार करना लीक से हटकर ही संभव होता है। पुरानी लीक से केवल एक बार हटने से नई लीक तैयार होगी और लीक से हटने का हमारा हेतु विफल होगा। विचार करने की प्रक्रिया ही बंद हो जाएगी । हमारे पूर्वजों ने जो कुछ कहा है, वह केवल बुजुर्गों ने कहा है, इसलिए हम स्वीकार नहीं करेंगे। यदि हमने वैसा किया तो वह अन्धानुकरण होगा, दकियानूसी होगी। हमें दकियानूस नहीं बनना है, कोई नया संप्रदाय नहीं बनाना है। सदैव सजग रहना है।
इस संसार में जो पीड़ा है, दुःख -दर्द है, वह काम कैसे हो ; वैसे ही सत्य क्या, असत्य क्या; उचित क्या, अनुचित क्या, यह खोजते रहना है। साथ ही मानव इतना दुःखी क्यों ? यह दुःख किन उपायों से कम होगा, इसकी खोज जारी रखनी है। निरंतर-आखिरी सांस तक - जारी रखनी है। इस वजह से हम ईश्वर की शरण नहीं ले सकते। यदि सभी घटनाओ के मूल में हम ईश्वर को देखने लगें तो हमारी खोज बंद हो सकती है। हमारी खोज जारी रखने के लिए ईश्वर के अस्तित्व का असंदिग्ध प्रमाण मिलने तक हम मान कर चलेंगे कि ईश्वर नहीं है। सुधारक होना, इहवादी होना , विवेकी होना एक अनवरत प्रयास है। पुराना ढर्रा हमेशा के लिए छोड़ने का, स्वतंत्र विचार करने का यह असमाप्त यत्न है। जीवन के हर क्षेत्र से श्रद्धा (faith) हटाकर विवेक को सर्वोपरि रखते हुए न्याय, समता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता लाना हमारा उद्देश्य है। इसी विचारधारा को हम विवेकवाद कहते हैं। सुधारक के प्रकाशन का उद्देश्य पाठकों को विवेकवाद से परिचित कराना है।
विवेकवाद मानव-आचरण का अध्ययन करता है, इसलिए कि उसे मानव को अधिक सुखी बनाना है । इस संसार में समता प्रस्थापित करना है, विषमता के मूल कारण खोजकर उन्हें हटाना है। वर्तमान अर्थ-व्यवहार, राजनीति, धर्म की इमारत विषमता की नींव पर रची गई है । शिक्षा के मध्यम से हमें इन सभी क्षेत्रों में आमूल बदलाव लाना है। यह उद्देश्य साध्य करने के लिए शिक्षा में भी बदलाव लाने पड़ेंगे. विवेकवाद के दायरे के बहार मानव वर्तन का एक भी क्षेत्र ना होगा। बहुत सारे दुखों की जड हमारी विवाह्संस्था में है। विवाह संस्था , स्त्री-पुरुष संबंध पर भी हमें पुनर्विचार करना पड़ेगा।
अतीत में , जिन्होंने समाज में उचित बदलाव लाने के प्रयास किये हैं, ऐसे सुधारकों का परिचय अपने पाठकों से करना यह पत्रिका अपना कर्तव्य समझेगी और यह सब करते हुए वह अपने को विभूतिपूजा और महिममन्डन से दूर रखेगी। अंधविश्वास पर वह टूट पड़गी। किसी व्यक्ति का अपमान न करते हुए वह सभी तत्त्व, विचार या सिद्वांत बार-बार परख कर ही स्वीकार करेगी। इसका मतलब ऐसा हरगिज नहीं है कि सम्पादक की अपनी कोई राय ही नहीं है। सम्पादक का अपना विशेष दृष्टिकोण है। किन्तु , वही दृष्टिकोण सही है , उसे ही लोगों को आंख मूंदकर मान लेना चाहिए , ऐसा आग्रह नहीं। उसका जोर चर्चा पर है । पाठकों को अपना-अपना मत आवश्यक अध्ययन एवं सभी अनुकूल-प्रतिकूल मुद्दों का विमर्श करने के बाद बनाना चाहिए, संपादक के प्रतिपादन से नहीं, यही विवेकवाद की मान्यता है।
सुधारक के सभी पाठक और सम्पादक एक दर्जे के होंगे। प्रकाशन का जिम्मा किसी को उठाना चाहिए, इसलिए मैं सम्पादक बना हूँ। अन्यथा मैं भी आप पाठकों जैसा समुचित, योग्य और सत्य की खोजबीन में लगा हूँ।

दिवाकर

Monday, June 18, 2007

'समाज सुधार' की सही दिशा

गोपाल गणेश आगरकर को गुजरे सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन उनका यह लेख अब भी प्रासंगिक है. अगले लेख में हम सुधारक के होने कि वजह पर प्रकाश डालेंगे,

'समाज सुधार' की सही दिशा

...'समाज सुधार' सही माने में किन बातों में निहित है, इसे बहुत ही सोच-समझकर तय करना होगा। क्योंकि अक्सर होता यह है कि किसी विशिष्ठ विचार-प्रवाह में बह जाने वाले या किसी मत-प्रणाली के अधीन होकर उसका अन्धानुकरण करने वाले मनुष्य को , वास्तविक अर्थ में 'समाज सुधार' किस बात में है, यह भली-भांति समझ न पाने से, उसे हर पुरानी बात को निकल फेंकने तथा किसी नई बात को अपनाने में कोई बहुत बड़ा समाज सुधार का काम करने का भ्रम हो जाता है। ऐसे लोगों को सुधारक की बजाय 'दुर्धारक' अर्थात समाज का अहित करने वाला या समाज विघातक कहना ही ठीक है। उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में बहुत सारी बुराइयां हैं, इसलिये यहूदी, मुस्लिम, ईसाई या ऐसे ही किसी धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति को विचारशील कहना ठीक नहीं है। जिस देश में हमारे सैकड़ों पूर्वज पैदा हुए, पले-बढ़े और जिन्दगी जीकर सिधार गए, जिस देश में हज़ारों पीढ़ियों के महत्प्रयासों, कष्टों का फल हमें एक थाती के रुप में अनायास ही प्राप्त हुआ, ऐसे देश के धर्म, रीती-रिवाज व लोगों का पूरी तरह त्याग करने वाले मनुष्य को सुधारक का सम्मान शोभा नहीं देता। स्वदेश व स्वभूमि में, स्वजनों के साथ अपने सत्त्वशील आचरण पर अडिग रहकर, अपने देशवासियों के अज्ञान व अविचार को डरे बिना, उनसे कभी लड़-झगड़ कर, कभी युक्तिवाद की चतुराई से, कभी लाड़- प्यार-दुलार के हुनर से या कभी अपने में दमख़म हो तो डांट-dapat अरे उनकी दकियानूसी बातों में सुधार करने में ही सच्ची देशभक्ति, सही भाईचारा, सच्चा देशाभिमान, उचित समझ-बूझ और सत्यशील पुरुषार्थ है। इसके उल्टे जो लोग विपरीत बर्ताव करते हैं, वह समाज सुधार का कोई काम तो नहीं करते, बल्कि एक प्रकार बेड़ियाँ तोड़कर दूसरे प्रकार की बेड़ियाँ में जकड जाते हैं।

Wednesday, June 13, 2007

बहुत दिन हो गए आप लोगों से बात नहीं हुई। हमने इस ब्लोग को नारद से जोड़ दिया है। कम से कम आप लोगों की प्रतिक्रिया आये तो अच्चा हो।

भागवान को लेकर हमारी नाउम्मीदी बहुत है।