Sunday, April 29, 2007

भगवान् के खिलाफ

भगवान् के खिलाफ लिखने पर मुझे उम्मीद थी कि कोई तो प्रतिक्रिया होगी। लोग इस मुद्दे पर चर्चा करने पर आगे आएंगे। लेकिन लगता है, ये युग ऐसी बातों को मानने वालों का है, जो वास्तव में हैं ही नहीं। खैर उम्मीद है कि कुछ लोग तो इस ब्लोग को पढ़ रहे होंगे। अगर वो चाहते हैं कि इन मुद्दों पर बहस की जाये तो आगे आयें। धन्यवाद्।

Monday, April 16, 2007

मेरी बात पिछली बार अधूरी रह गई थी। फिर से एक बार शुरुआत कर रहा हूँ । सुधारक के मूलत: दो एजेंडा हैं। पहला यह कि समाज में व्यापक एवं आमूल-चूल बदलाव किए जाएं । दूसरा, इसके लिए रास्ता खोजा जाये। हम कुछ बातों पर जोर देना चाहते हैं। मसलन, ईश्वर के अस्तित्त्व पर सवाल कड़े किये जाएँ, क्योंकि वह भाग्यवादिता सिखाता है। हम तो यह कहना चाहते हैं कि ईश्वर है ही नहीं। अगर कोई वैज्ञानिक तरीके से साबित कर दे तो हम मान लेंगे। यानी विचारों की जड़ता को हम खत्म करना चाहते हैं। इसके अलावा समाज की राह में सबसे बड़ा रोड़ा पैसा है। पैसा यानी मुद्रा वास्तव में ईश्वर जैसा ही जड़ विचार हो गया है। इसलिये पैसे को ख़त्म करना सबसे जरूरी है। एक बात ये और महत्वपूर्ण है कि हम जो बात मानते हैं, वह हमारी मात्र धरना है। जरूरी नहीं कि वह सत्य हो।

Friday, April 6, 2007

सुधारक के साथ हम एक प्रयोग की शुरूआत करने जा रहे हैं। वास्तव में सुधारक हमारी पत्रिका है। दो भाषाओं में निकलती है।